हार्टफुलनेस मैगजीन दिसंबर 2020 की समीक्षा

मैं हार्टफुलनेस मैगजीन दिसंबर 2020 से पढ़ रहा हूं वास्तव में मैंने जिंदगी में इतनी अच्छी मैगजीन नहीं देखी जितनी की यह मैगजीन है इस मैगजीन में जितने भी लेखक हैं उन्होंने जो जिंदगी जी है वही लिखा है अपने अनुभव को लिखा है अपने अनुभवों को पाठकों से शेयर किया है इसलिए यह मैगजीन कोई झूठ का पुलिंदा नहीं है बल्कि यथार्थ है जो जिंदगी को जीने के लिए प्रेरित करती है। अर्थात जिंदगी ह्रदय केंद्रित हो। मैं पहले लेख से समीक्षा आरंभ करता हूं तो देखता हूं कि युवा-स्व के साथ संवाद और इसके लेखक चार्ल्स आइंजस्टाइन का लेख युवाओं के लिए अत्यंत ही प्रेरणादायक है ।युवाओं के साथ संवाद करते हुए लिखते हैं कि अपने ज्ञान पर भरोसा रखो की यह दुनिया बदल सकती है । यह दुनिया पहले से बेहतर हो सकती है । इसमें तुम्हारे योगदान की आवश्यकता है। तुम दुनिया के दर्द को कम कर सकते हो । हमेशा तुम्हें वह कार्य करना चाहिए जो तुम्हें खुशी दे, वह कार्य तुम्हें बिस्तर से उठने के लिए प्रेरित करें ,जीवन को सिर्फ अनुशासन और त्याग से भरा कठोर दिखाने वाला नहीं होना चाहिए ,स्कूल में ऐसी जिंदगी तुमने जी ली है, इसमें तुम्हें कठिनाई आएगी लेकिन यात्रा शुरू करना है ,हम देखते हैं कि आजकल स्नातक बर्तन धो रहे हैं और पीएचडी होल्डर टैक्सी चला रहे हैं ऐसे लोगों की तलाश करो जो तुम्हारे दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं तुम इस यात्रा में लड़खड़ा सकते हो लेकिन उससे तुम खजाने को देख पाओगे जो तुम्हारे पैरों तले था

माइकल ए सिंगर — निर्बाधित आत्मा– स्वयं से परे की यात्रा। सारे ब्रह्मांड के स्वरूप को समझना आसान है लेकिन मन के स्वरूप को समझना बहुत ही मुश्किल है। ध्यान से मन को समझ सकते हैं। आपको मन से पृथक होकर देखना होगा कि मन क्या नहीं है? ऐसा करने से आप देख पाएंगे कि मन क्या है । ध्यान द्वारा आपको यह दृष्टिकोण मिल सकता है ।गहरे ध्यान में आप मन को थोड़ी दूर से देखते हैं जैसे आप आसमान में तारा देखते हैं ।मन से ज्यादा भी कोई शक्तिशाली है जो संसार में आपके व्यवहार को प्रभावित करता है वह है आपका ह्रदय ,आपका ह्रदय विचार पैदा करने वाले उर्जा के क्षेत्र से बिल्कुल अलग है। आप अपने अस्तित्व के स्वरूप को खोजने में तब तक असमर्थ होंगे जब तक आप इस दुनिया मैं अपने मन और ह्रदय के साथ शांति व सामंजस्य स्थापित नहीं कर लेते हैं । यही आपका आध्यात्मिक कार्य है ।इस संसार को, इस मन को, और इस ह्रदय को मुक्त करना ही हर दिन के हर पल की सर्वोच्च आध्यात्मिक साधना है जब यह तीनों अपने स्वरूप के प्रति सच्चे होने के लिए मुक्त हो जाते हैं तब आप भी अपने स्वरूप के प्रति सच्चे होने के लिए मुक्त हो जाते हैं यही अपने अस्तित्व के स्वरूप की ओर लौटने की यात्रा है

अनिता मुरजानी–अनंत तक पहुंच — एक बार जब मैंने जान लिया कि मेरे इस अनंत अस्तित्व के बाहर कुछ भी नहीं तब मैं स्वयं को एक ऐसी कृति के रूप में समझ सकी, जो पूर्णता प्राप्त करने के लिए अविरत प्रयास कर रही है, लेकिन स्थिर रूप में नहीं, बल्कि गतिशील रूप में ।

चेतना का उत्थान— ब्रूस लिपटन–प्रश्न- मस्तिष्क कौनसे रसायन रक्त में भेजता है ? उत्तर — जो भी छवि आपके मन में होती है मस्तिष्क उसके अनुरूप रासायनिकता का सृजन करता है ।प्रेम का एक रसायन विज्ञान है यदि आप अपने जीवन में प्रेम का अनुभव करते हैं तो आप आनंद के लिए डोपामाइन उत्सर्जित करते हैं।वेसोप्रेसिन आपको अधिक आकर्षक बनाता है जिससे आपका साथी आपके साथ रहता है ,ऑक्सीटॉसिन आपको अपने प्रेमी से बांधे रखता है और जब आप प्रेम में होते हैं तो तब वृद्धि के हार्मोन उत्सर्जित होते हैं। तो रक्त में यह सभी चीजें होती है जो मेरी प्रेम की छवि की वजह से हुई और रासायनिक क्रिया होती जाती है ।वृद्धि के हार्मोन से ऊर्जा और बढ़ती है और विकास होता है, इसलिए जो लोग प्रेम में होते हैं वह बहुत स्वस्थ रहते हैं ।यह प्रेम की रासायनिक ता का कमाल है ।आपकी चेतना ही आप के वंशाणुओ की स्वामिनी है ।आपका जीवन आपकी चेतना का दृश्य रूप बन जाता है । आपके विचार ही आपके संसार का निर्माण करते हैं ।ई.इ.जी से मस्तिष्क के विचार पढ़ सकते है ।एक नया उपकरण है मैग्नेटो-एंसीफेलोग्राम जो दूर से विचारों को पढ़ सकता है। मेरे विचार मेरे मस्तिष्क के अंदर नहीं है मेरे विचार एक ऊर्जा क्षेत्र में प्रसारित होते हैं, इसलिए मैं अपने मस्तिष्क के चारों ओर चेतना का एक क्षेत्र बनाता हूं। मुझे अल्बर्ट आइंस्टाइन का यह कथन बहुत पसंद है क्षेत्र ही कणों को नियंत्रित करने वाला एकमात्र माध्यम है ।

समानुभूति का मूल अधिकार —-मेरी गार्डन का साक्षात्कार जुडिथ नेल्सन द्वारा —साक्षात्कार के अंश में वे माननीय रिश्तो में समानुभूति के महत्व पर अपना वैश्विक नजरिया व्यक्त कर रही है और बता रही है कि कैसे यह उस कार्यक्रम का आधार है जो उस स्कूली बच्चों में समानुभूति विकसित करने के लिए वह स्कूलों में चलाती है । जिसका नाम है और रूट्स आफ एंपैथी ,(समानुभूति का मूल आधार) बच्चे दयालु हो, विचारशील हो, परस्पर सहयोगी हो, देखभाल करने वाले हो ,रुट्स ऑफ एमपेथी के बच्चे ऐसे ही है। पहले बच्चे स्वयं का सम्मान करें,स्वयं को प्यार करें और स्वयं के साथ सहानुभूति रखें तभी वे दूसरों से प्यार करेंगे और दूसरे के साथ समानुभूति रख सकते हैं ।वास्तव में बड़े होने पर देखते हैं कि हमें बहुत अधिक आत्म प्रेम की जरूरत है जो हमें दूसरों को प्यार करने की क्षमता देता है।

प्रेरक और प्रतिक्रिया के बीच— डाक्टर जेम्स डोटी, जॉन मालकिन से साक्षात्कार के अंश — ध्यान के विज्ञान , दया भाव के विकासमूलक फायदो, दया भाव व सामूहिक सामाजिक मुद्दों से संबंधित मानवीय व्यवहार के पहलुओं के बारे में बातचीत है । जब हम दिल के घाव को भरने पर ध्यान देते हैं केवल तभी दुनिया में शांति संभव है। पूरा विज्ञान और तकनीक मिलकर भी ऐसा नहीं कर सकते । इसमें और रुथ की तरकीबो का वर्णन है । शरीर को रिलैक्स करना, मन को साधनेकी विधि ,अपने दिल को खोलना, मनस दर्शन (Visualisation) तकनीकी द्वारा स्पष्टता विकसित करना।

परस्पर संबद्धता— डॉ वंदना शिवा ने ह्यूज के साथ धरती की पवित्रता तथा स्थाई खेती के क्षेत्र में जागरुकता और बदलाव लाने से संबंधित अपने कार्य के बारे में बात की। उन्होंने प्रकृति के साथ हमारी परस्पर संबद्धता को समझने के महत्व पर भी बात की और बताया कैसे हम अपने खाने के तरीकों को बदल सकते हैं। लालच से जो मूर्खतापूर्ण भौतिकवाद जन्मा है उससे आध्यात्मिकता एक प्रतिक्रिया के रूप में आई है ।

जो प्रायःसिर्फ एक आंतरिक जीवन के रूप में परिभाषित होती है लेकिन आध्यात्मिकता का मूल सिद्धांत हमारी परस्पर संबद्धता को जानना है। यानी अंदर और बाहर में कोई अंतर नहीं है ।पृथ्वी के प्रति किसी भी प्रकार की हिंसा हमारे आध्यात्मिक अस्तित्व के पतन के कारण हैं। जैसे जैसे हमारे आध्यात्मिक अस्तित्व का हर पहलू सचेत होता जाता है वैसे वैसे हम दूसरों को नुकसान पहुंचाना बंद कर देते हैं ।जैसे पृथ्वी और मनुष्य को अलग नहीं किया जा सकता उसी प्रकार आध्यात्मिक और भौतिक जीवन को भी अलग नहीं किया जा सकता प्रत्येक जीवन पवित्र है तभी सच्ची आध्यात्मिकता स्थापित होगी

विशिष्ट संबंध जोड़ना –लेवलिंन वैन ली का निवेदन-—- हमारी पृथ्वी न सिर्फ एक आत्मा है बल्कि एक शरीर भी है जिसे पश्चिम में अणिमा मुड़ी अर्थात विश्व की आत्मा कहते हैं । इसे कोलंबिया के सिएरा नवाड़ा में कोगी जनजाति अलुना यानी प्रकृति की आध्यात्मिक बुद्धिमता कहतीहैं ।आध्यात्मिक सक्रियता वाद एक ऐसा उभरता हुआ क्षेत्र है जो हमारे वर्तमान वैश्विक संकट को आध्यात्मिक रूप से हल करने की बात करता है।यह संकट है हमारे वर्तमान सामाजिक भेदभाव एवं पारिस्थितिकी विनाश का ,यह संकट है जीवन की परस्पर निर्भर एकात्मता को अपनाने के बजाय अलगाव की पुरानी आत्मघाती धारणा के साथ तादात्म्य स्थापित करने का ।

चेतना का क्रमिक विकास— स्थिरता का विरोधाभास —श्री कमलेश डी पटेल –(दाजी )ने चेतना के क्रमिक विकास पर अपने लेखों की श्रंखला को जारी रखते हुए स्थिरता का विरोधाभास पर एक लेख लिखा, उन्होंने लिखा कि यह विरोधाभास चेतना के निरंतर विस्तार और विकास के कारण प्रकट होता है ,वह जो विस्मित और भावविभोर होकर कुछ लम्हों के लिए ठहर

नहीं सकता वह मृतप्राय है । उसकी आंखें बंद है। मन की स्थिरता ही प्रसन्नता लाती है। जब मन की बाहय स्थिरता आत्मा की आंतरिक स्थिरता से मेल खाने लगती है सब कुछ एकीकृत हो जाता है यही सहज समाधि है और इसी अवस्था को प्राप्त करने के लिए हम ध्यान करते हैं।

वर्तमान विश्व की सबसे बड़ी समस्या का हल ” —नील डोनाल्ड वाल्श –– सभी मुश्किल है एक ही व्यापक स्थिति का प्रभाव और प्रत्यक्ष परिणाम है। उस स्थिति को एक ही शब्द में व्यक्त किया जा सकता है ,”अलगाव ” मनुष्य एक दूसरे से दूर हो गए हैं और हम इस अलगाव को प्रतिदिन बढ़ता हुआ अनुभव कर रहे हैं हम ऐसे संसार में पहुंच गए जहां लोगों में एक दूसरे का विरोध करने की भावना , हम और हमारे खिलाफ में अत्यधिक बढ़ गई हैं ,इस अलगाव को दूर करने का उपाय है “इरादा” और यह शक्तिशाली चुंबक की तरह काम करेगा यह जानकारी अनेक साधनों से मिल जाएगी,उन साधनों द में यह पत्रिका भी है तो यह पत्रिका हमेशा पढ़ते रहिए।

डॉक्टर जो डिस्पेंजा— ह्रदय केंद्रित जीवन –डिस्पेंजा ह्रदय और मस्तिष्क के बीच के तालमेल की बात करते हैं और ह्रदय यानी इसे बोध कराने वाले अंग के द्वारा सोचने से जानने की ओर बढ़ने के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हैं ।जब से हमारे पुरखों ने गुफाओं की दीवारों और पत्थरों पर अपने इतिहास को उकेरना शुरू किया तब से समय के चलते हमारा ह्रदय स्वास्थ्य ,विवेक, अंतर्ज्ञान, मार्गदर्शन और उच्चतर बुद्धिमता के प्रतीक के रूप में प्रकट होता है । प्राचीन मिस्र के लोग जो ह्रदय को इब कहते थे यह मानते थे कि ह्रदय ही संपूर्ण जीवन का केंद्र और मानवीय ज्ञान का स्त्रोत है ना कि मस्तिष्क का ।

परिवर्तन का कारक” रास्पबेरि –अलेण्दा ग्रीन– दृष्टिकोण के विषय पर लिख रही है.वे बगीचे में रा

रास्पबेरि तोड़ते समय हुए अनुभव के द्वारा जीवन और परिस्थिति को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने के महत्व को समझने का प्रयास कर रही है गुरु दलाई लामा कहते हैं की मन का हर परिवर्तन ह्रदय में परिवर्तन से शुरू होता है ।शीर्षासन से उन्होंने सीखा कि स्वेच्छा से अपने मन में संजोए धारणाओं वह मान्यताओं को उलट देना मुक्ति का मार्ग है ।कभी-कभी तुम मुझसे छुपते हो तब शायद मैं ही तुमसे छुपी होती हूँ इसमें ज्ञान निहित है। भूलने और याद करने की प्रक्रिया चलती रहती है ।ये बेरिया इंतेजार करती है कि उन्हें पहचाना जाए ,उन्हें देखा जाये। अंत में पूरी मैगजीन का सारांश यह है कि व्यक्ति को हृदय केंद्रित होना चाहिए तब ही उसका संतुलित विकास हो सकता है । वैज्ञानिक भी शोध कर चुके है कि हृदय का अपना अलग मष्तिस्क होता है इसलिए हृदय प्रधान बनने की प्रेरणा मिलती है। संपादक मंडल लेखकों और साधको को साधुवाद ।

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