हार्टफुलनेस मैगजीन फरवरी 2021 की समीक्षा

शून्य की ओर, और उससे आगे– अनेलडिविल का लेख

औद्योगिक क्रांति दुनिया के इतिहास में परिवर्तन का एक बहुत महत्वपूर्ण कारक रहा है ।अचानक इस नए युग में औसत आय और मानव जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि दिखाई देने लगी है। हालांकि अब 200 वर्ष बाद हम यह मान रहे हैं कि यह कैसी प्रगति है जो प्रकृति के समग्र नाजुक संतुलन के लिए हानिकारक है ।केवल एक प्रजाति की विकास यात्रा दूसरी लाखों प्रजातियों की जीवन यात्रा को नियंत्रित करने में और जीवन को ही खतरे में डालने में कैसे सफल हो सकती है । औद्योगिक क्रांति का अंतर्निहित मूल सिद्धांत अधिक ,अधिक ,और अधिक लेने पर आधारित था ।अधिक प्रगति हुई ,शेयरधारकों को ज्यादा कीमत मिलने लगी ।इन दिनों जागरूक नेता और जागरूक नीति निर्माताओं का एक ही मंत्र है ,शून्य प्राप्ति उद्देश्य,शून्य उत्सर्जन ,शून्य कार्बन व्यवस्था, शून्य कार्बन फुटप्रिंट ,शून्य पर्यावरण पर प्रभाव, शून्य प्रदूषण, शून्य गरीबी, शून्य भुखमरी,शून्य बेरोजगारी इत्यादि ।

जीवन का उद्देश्य लेना या देना – फ्रोसुआ बोडर लीक

वर्तमान स्थिति ने मुझे अध्यात्म और आध्यात्मिक क्षेत्र के अर्थ के बारे में भी सोचने पर मजबूर कर दिया क्या अध्यात्म का संबंध प्राप्त करने की क्षमता के बजाय जीवित रहने और देखभाल करने की क्षमता के ज्ञान से हैं । आप देखिए कि किस प्रकार लेना शब्द हमारी भाषा और हमारे तथाकथित आधुनिक जीवन में हावी हो गया है। निर्णय लेने से लेकर कुछ करने के लिए समय लेने तक में या किसी व्यक्ति अथवा किसी वस्तु की देखरेख में लेने में यदि हम इस नई परिभाषा को स्वीकार करते हैं तो आत्मा के क्षेत्र में हमारी समस्त गतिविधियां शामिल होगी या कुछ वैसा ही है जैसा कि मैंने एक प्राकृतिक जीवन जीने वाली जाति के के साथ रहकर खेती करते हुए अनुभव किया जहां परवाह करना जीवन का एक स्वाभाविक तरीका है इसलिए दोस्तों क्यों ना हम ज्ञान के उस क्षेत्र में कदम रखे जो परवाह करने की भावना पर आधारित हो और उस प्रक्रिया में हम अपने लिए उतना ही ले जितना आवश्यक है। ऐसा करने से जीवन सरल और स्वाभाविक हो जाता है। यदि हम इस प्रकार के ज्ञान के विद्यार्थी बन जाए चाहे वह कृषि हो या कोई और चरित्र और हम परवाह करने में उत्कृष्टता प्राप्त करें तो हम उस प्रक्रिया में आत्मा का वह हिस्सा बन जाएंगे जो जीवंत रहता है और सर्वप्रथम देता है। मेरा विश्वास कीजिए मैंने इसे अपने खेत पर अनुभव किया इसका सबसे स्वाभाविक परिणाम होगा कि हमे ऐसी रणनीति बनाने की जरूरत नहीं होगी की और अधिक कैसे लें, क्योंकि हम कम से कम प्रयास करके अधिक से अधिक प्राप्त कर रहे हैं।

संकट को अवसर में बदलना — नेतृत्व की चुनौती भाग 2

स्वर्ग का लक्ष्य रखोगे तो इस कोशिश में आपको धरती तो मिल ही जाएगी ,धरती को लक्ष्य मानोगे तो कुछ भी नहीं मिलेगा। पूर्ण एकीकरण क्या है? एकीकरण का वह सर्वोच्च स्तर क्या है जो आप सोच सकते हैं वह प्रेम है ,जब आप प्रेम करते हैं तो समय और स्थान का कोई महत्व नहीं होता। प्रेम का प्रतीक क्या है एक हीरा, एक हीरा क्यों क्योंकि यह सर्वाधिक एकीकृत पदार्थ है और प्रेम का एकीकरण है ,आंकड़ों के प्रबंधन से ऊपर देखें तो कौन सी कंपनी भविष्य में सफल होगी, वही जिस की कार्यशैली एकीकरण पर आधारित होगी । जहां आपसी विश्वास और सम्मान नहीं होगा, प्रेम भी नहीं होगा ,इनके बिना एकीकरण भी नहीं होगा, इनके बिना शांति भी नहीं होगी,हिब्रू भाषा में शांति के लिए श्लोम शब्द का प्रयोग करते हैं इसका अर्थ है संगठित एकीकृत अखंडता ।जहाँ शांति होती है वहां अखंडता होती है ।आपके पास एक दिशा सूचक यंत्र है ,देखें सही दिशा कहां है ? क्या आप ही विश्वास को बढ़ा रहे या फिर से नष्ट कर रहे।

ह्रदय पूर्ण प्रवर्तक भाग 2

रवी वेंकेटेशन इस लेख में बुद्धि की भूमिका के बारे में जानकारी देते हैं और बताते हैं कि यह नवप्रवर्तन में किस प्रकार कार्य करती है वह कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं आर्कमिडीज ने जैसे ही टब के अंदर प्रवेश किया उन्होंने पानी के बढ़ते हुए स्तर को देखा और इस अवलोकन को कई परीक्षणों में परिवर्तित किया जो अनेक अविष्कारों का आधार बने जैसे आर्कमिडीज स्क्रू जिसका उपयोग अभी भी तरल पदार्थों को निकालने के लिए किया जाता है । न्यूटन ने अपनी खोज में अपवर्तन लेंस के बजाय परावर्तन दर्पण का उपयोग किया। उस नवप्रवर्तन से हमें छोटी दूरबीन और अधिक स्पष्ट छबिया प्राप्त हुई। मेरी क्यूरी द्वारा चलती फिरती एक्स रे मशीन की खोज ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बहुत से जानें बचाई। इन सभी मामलों में बुद्धि में एक बदलाव हुआ था जिससे उसकी अवस्था परिष्कृत या विकसित हुई। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह लोग बुद्धिमान महिलाएं और पुरुष थे लेकिन किस चीज ने उन्हें प्रेरित किया कि वे कुछ ऐसा समझ पाए जिसे दूसरे लोग नहीं समझ पा सके, जिससे वे यूरेका या आह का पल प्राप्त कर पाए ।कुछ मामलों में किस चीज से ऐसे अनेक पल मिले ? अगर हम उन वैज्ञानिकों की कुछ आदतों का अध्ययन करें तो कुछ संकेत मिलते हैं । आइंस्टाइन दिन में 10 घंटे सोते थे ,न्यूटन एकांतवास में चले जाते थे और अपने आप को सबसे अलग कर लिया करते थे, जब उन्होंने गुरुत्वाकर्षण की खोज की थी तब भी वे एकांतवास में थे,ऐसा लगता है कि किसी न किसी तरीके से एक गहरी विश्रांति की अवस्था लाकर बुद्धि, बुद्धिमत्ता में परिवर्तित हो जाती है। और अंतर ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयार हो जाती है ।आधुनिक समय में कई कंपनियों ने ध्यान कार्यक्रम शुरू किए हैं ताकि कर्मचारी तनाव का सामना कर सके और विश्रांत हो सके इसका एक दिलचस्प प्रभाव यह है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट सेल्स फोर्स, इत्यादि जैसी कंपनियां जिनमे इस तरह के कार्यक्रम किये जाते हैं सबसे अधिक नवप्रवर्तन करने वाली कंपनियों में से एक है, या यह एक संयोग है या इसमें कुछ और भी है।

संगीत का ध्वनिक वातावरण भाग 2

शुभेंदु कहते हैं कि मुझे लगता है कि शिक्षा के क्षेत्र में सबसे कम सिखाया गए विषयों में एक संगीत है। सिर्फ अभी ही नहीं बल्कि हमेशा से ही प्राचीन काल में गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत शिक्षा समग्र रुप से दी जाती थी । जिसमें एक बच्चे को बहुत सारी अलग-अलग विधाओं का अनुभव कराया जाता था । फिर शिक्षा को संस्थागत कर दिया गया है। ऐसा करके हमने रचनात्मकता के पंख कतर दिए। यह व्यवस्था हर वक्त को एक निश्चित औसत पर देखना चाहती है जबकि कोई भी औसत नहीं होता है और होना भी नहीं चाहिए । विभिन्न स्तर होते है किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि कोई किसी से उच्च स्तर पर है। एक तरह से हर कोई समान नहीं है जैसा कि संस्थागत शिक्षा आप को बनाती है तो यही वह पहलू है जिसमें हम म्यूजिक फ़ॉर ऑल के माध्यम से परिवर्तन लाना चाहते हैं। प्रत्येक बच्चे के जीवन में जीरो से 9 वर्ष की आयु का समय अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है आप के जीवन की 70 प्रतिशत सीख इसी दौरान आप में अंत:स्थापित हो जाती है ।बच्चे के दुनिया में आने के 9 महीने पहले से लेकर 8 या 9 वर्ष की आयु तक इस सीख का बीजारोपण होता है जो इस पर निर्भर है कि आप कहां पर बड़े हो रहे हैं । आज कल की दुनिया में मैं कहूंगा कि यह आयु सीमा 7 या 8 वर्ष की है जबकि पहले के समय में इसे हम 10 या 12 वर्ष की आयु तक ले जा सकते थे। आजकल इतनी ज्यादा जानकारियां उपलब्ध है कि बच्चे अपना बचपन बहुत जल्दी खो देते हैं ।हमारे बेटे ईशान की बात करें हम अपने गुरु पंडित रविशंकर से दोपहर के भोजन पर मिलने गए थे। और 3 से 4 घंटे के बाद वह गुरु जी के साथ गा रहा था ।गुरुजी 80 वर्ष से अधिक आयु के थे और हमारा बेटा 2 वर्ष का लेकिन उन्होंने उस दिन जो कहा वह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है उन्होंने कहा, बेटा हीरा तो है लेकिन जब तक संभव हो सके यह भी सुनिश्चित करो कि यह बच्चा बना रहे। इसलिए जब वह 19 वर्ष का था तब भी वह बच्चा ही था। महान लोग सीखने का ,अनुभव करने का अपना बाल सुलभ उत्साह कभी नहीं खोते ।

संकट कॉल में अपनी देखभाल

ट्रेसी पेप ममता वेंकट के साथ बातचीत करते हुए वैश्विक महामारी के दौरान और इसके बाद भी अपनी भावनाओं को स्वीकार करने और अपनी देखभाल स्वयं करने एवं अपने प्रति सहानुभूति को व्यवहार में लाने के बारे में अपने विचार और अनुभव साझा कर रही हैं ।उन्होंने कहा मैंने ज्यादा तर समय चुपचाप रह कर दुख को झेला है । और शायद यही कारण है कि मैंने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपना व्यवसाय चुना ।उस नकारात्मकता को दूर करने के लिए जो मानसिक बीमारी से जुड़ी है और उन चीजों के बारे में बात कर पाने के लिए जिनके साथ हम जूझ रहे हैं। एक बार जब आप खुल कर बात करते हैं तब इससे आपको फायदा होता है और आप महसूस करते हैं कि आप अकेले नहीं हैं। मैंने धीरे-धीरे स्वसन क्रिया को अपने जीवन में अपनाया ।स्वसन क्रिया चिंता को कम करने के लिए एक चमत्कारिक तरीका है। दो आसान तरीके हैं जो मैं इस्तेमाल करती हूं और सिखाती हूं। पहला है त्रिकोण स्वसन, आप तीन या चार गिनते हुए सांस लेते हैं तीन या चार गिनते हुए रुकते हैं या सांस छोड़ते हैं और फिर तीन या चार गिनते हुए सांस छोड़ते हैं या रुकते हैं और हर 1 घंटे के बाद ऐसा करने से आप फिर से सामान्य हो जाते हैं और आपकी मांसपेशियां तनाव मुक्त हो जाती है ,शरीर तनाव मुक्त हो जाएगा ,और चिंताएं आपको परेशान नहीं करती इसलिए अगर आपको कहीं भी तनाव महसूस हो तो सांस लीजिए और कल्पना कीजिए कि आप सांस छोड़ रहे हैं । तनाव बाहर आ रहा है । जब आप चिंतित होते हैं तो आपका मनोभाव कुछ ऐसा होता है , मैं किस चीज के लिए कृतज्ञ महसूस करूं लेकिन जैसे ही आप तनावमुक्त और शांत हो जाते हैं तो खुद के प्रति दयालु हो जाते हैं और लगभग हमेशा ही कुछ ना कुछ अच्छा अपने आप आपके मन में उभर आएगा । जब हम एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं तो उसमें हम जैसे हैं वैसे ही रहने की स्वयं को प्यार करने की और यह समझने की स्वतंत्रता होती है कि वह जुड़ाव में एक तरह का उपचार है पहले मैं दूसरे व्यक्ति के बारे में सोच रही थी कि उसकी सहायता कैसे की जाए? इस प्रश्न के बारे में बहुत सोचने के बाद मुझे एहसास हुआ कि जब हम अपनी देखभाल करते हैं जब हम स्थिर रहते हैं तब दूसरे हमारे लिए चिंतित नहीं होते फिर जब हम उनसे बात करने के लिए उनसे संपर्क करते हैं तो हम स्थिर रहते हैं और पूरी तरह वहां उपस्थित होते हैं।

अंतर्ज्ञान विकसित करें

मन जितना शांत होता है अंतर्ज्ञान उतना ही अधिक कारगर होता है। जब मन अत्यधिक चंचल हो इधर उधर भाग रहा तो निष्पक्षता प्राप्त नहीं की जा सकती मन में इतनी हलचल मची रहती है कि अंतर्ज्ञान की हल्की सी आवाज पर हम ध्यान नहीं दे पाते अतः सबसे पहले मन को शांत करने और अंतर्ज्ञान की शक्ति को विकसित करने हेतु मन को तैयार करने के लिए ध्यान को अपनाना आवश्यक प्रतीत होता है दूसरा मैंने यह पाया कि जब भी मुझ पर भावनाएं हावी हो जाती है अंतर्गत ज्ञान कार्य नहीं करता है जब मुझ में कुछ तीव्र पसंद या नापसंद होती है मेरी मानसिक स्थिति अचानक उस कारण बहुत ज्यादा बदल रही होती है तब अंतर्ज्ञान मेरा मार्गदर्शन नहीं करा पाता । भावनाएं अपने अंदर सब कुछ समाहित कर लेती है और जब हम कुछ महसूस कर रहे होते हैं तो पुनः उस समय तटस्थ बने रहना और अंतर मन की आवाज सुनना कठिन हो जाता है। अंतर्ज्ञान की शक्ति प्राप्त करने के लिए पहला कदम है एकदम शांत और भावनाओं से मुक्त मन का होना मुझे लगता है तीसरा उत्तर ग्रहण शीलता होना चाहिए कभी-कभी हमारे अंतर ज्ञानी मन में जो बात कहने की कोशिश कर रहा होता है वह हमारे चेतन मन से परे चले जाती है मान लीजिए कि हम किसी से मिलते हैं और हमारे चेतन मन को सब कुछ बिल्कुल ठीक लगता है वह व्यक्ति कितनी अच्छी तरह से बात करता है और हम जो कुछ भी चाहते हैं उसके लिए वह बिल्कुल उपयुक्त लगता है फिर भी हमारे अंदर कुछ ऐसा एहसास होता है सब कुछ सही या ठीक नहीं। अंतर्ज्ञानी मन ब्रह्मांड से जुड़ा होता है और आगे तक की बातें जान लेता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम ग्रहणशील बने और जो सामने दिखाई देता हो उसे ही ना मानकर उसके विपरीत विचारों को भी स्वीकार करें। केवल इस ग्रहण शीलता से ही हमारा मन हमारे वास्तव में बात कर सकता है।

शांति एवं करुणा आदतें छोड़ने और विकसित करने की कला भाग 2

दाजी ने पिछले महा में बताया था कि किस प्रकार हम अपनी आदतों और व्यवहार को बदल सकते हैं । उसी लेख को इस बार भाग 2 में आगे बढ़ाया है ।शांति प्राप्त करने के लिए हमें किन बाधाओं को हटाना होगा। वे ऐसे मानसिक भटकाव है जो हम अपनी चेतना के क्षेत्र में एकत्रित करते जाते हैं। और उनकी वजह से भारीपन जटिलता और भावनात्मक हलचल उत्पन्न होती रहती है ।जब तक हम इनजटिलताओं को जिन्हें सामूहिक रूप से संस्कार कहा जाताभी, हटा नहीं देते शांतिपूर्ण महसूस करना कठिन होता है ।क्योंकि वे ऊर्जा के ऐसे भंवर ग्रंथियां बनाते हैं जो हमारे आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं। इस ग्रंथियों के कारण हमारे अवचेतन मन में विशिष्ट नियोजन बन जाते हैं और हमारे तंत्रिका तंत्र में कुछ विशेष तंत्रिका मार्गों में अत्यधिक जमाव हो जाता है ,इस प्रक्रिया के कारण आदते बनती है और विज्ञान से पता चलता है कि इस प्रक्रिया से एक नई आदत बनने के लिए बार-बार लगातार दोहराव जरुरी होते है। यह सब एक विचार के इरादे से शुरू होता है । प्रेम से करुणा उत्पन्न होती है। योग प्रेम से शुरू होता है जीवन का मूलभूत नियम जिससे जीवन का संचालन होता है वह है सबको प्रेम करो हम प्राणाहुति के द्वारा आत्मा से जुड़कर और आत्मा को पोषित करके प्रेम विकसित करते हैं। यदि हमारे ह्रदय में किसी व्यक्ति या किसी चीज को आहत करने का विचार भी रहता है तो हम पहले ही कदम पर असफल हो जाएंगे। हमारे हार्टफुलनेस के अभ्यास हमें सभी प्रकार की हिंसा पर नियंत्रण पाने में सहायता करते है। यही अहिंसा का सत्व है।

जीवन का स्वाद

जैसे-जैसे हम तीर्थ यात्रा करने के विचार को भूल गए हम इंसान के लंबे समय तक पैदल चलने के विचार को भी भूल गए वास्तव में यह आपको बदल देता है– रॉबिन डेविडसन

तीर्थ यात्रा को जारी रखना भाग 1

सार: वास्तव में यह अंक सहज बनने और अनावश्यक जटिलताओं को छोड़ने के विषय में है।

इस लेख में अलेण्डआ ग्रीन ने बताया की तीर्थ यात्रा क्या होती है ?यह यात्रा जितनी मंदिरों के भ्रमण से संबंधित है उतनी ही यह सीखने से भी संबंधित है कि कैसे अपेक्षाओं को छोड़ना है और सामंजस्य बनाए रखना है ।वास्तव में तीर्थयात्रा तो बहुत करते हैं लेकिन कभी यह जानने की कोशिश की है कि वह तीर्थ यात्रा का मतलब क्या है ?उसका आशय क्या है? तो यदि हमें जानना चाहते तो इसलिए को पढ़ना होगा उसमें एक युवा लड़की की लोक कथा के बारे में बताया है जो सड़क पर चल रही है उसके सामने एक दोराहा आता है दोराहे पर एक महिला बैठी थी , मुझे किस रास्ते पर जाना चाहिए लड़की पूछती है, तू कहां जा रही है? वृद्ध महिला पूछती है , मुझे वास्तव में नहीं पता लड़की उत्तर देती है ,तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस रास्ते पर जाना है बिना किसी लक्ष्य के मैं यह कैसे तय करूं कि मेरे लिए क्या मायने रखता है और उद्देश्य पर दृढ़ रहते हुए मैं कोशिश करना कैसे छोड़ दूं अगर मैं इसे पूरा ना करूं तो यह क्या तीर्थ यात्रा होगी ?आखिर एक तीर्थ यात्रा क्या होती है इसे जानने के लिए आप यह लेख जरूर पढ़िए और यह लेख अगले अंक में भी जारी रहेगा।

सार:- यह अंक हमें सिखाता है कि हम किस प्रकार सहज बने और अनावश्यक जटिलताओं को छोड़ने के विषय में लगातार प्रयास करें । संपादक मंडल साधकों और लेखकों को साधुवाद।

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