आत्मा का अस्तित्व स्वीकारा जाए

स्वामी विवेकानंद शिकागो लेक्चर के बाद बहुत प्रसिद्ध हो गए थे । तब वे वहां से यूरोप की यात्रा पर निकले और जगह-जगह उन्होंने वेदांत के दर्शन का पूरे यूरोप में प्रचार किया। एक दिन लेक्चर के बाद एक व्यक्ति ने पूछा की स्वमीजी सच्चा भारतीय कौन है? स्वामी विवेकानंद ने कहा सच्चा भारतीय वह है जो कर्म के सिद्धांत और पुनर्जन्म में विश्वास रखता है अर्थात वे आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते थे। आत्मा के अस्तित्व को प्रयोगशालाओं में तो सिद्ध नहीं किया जा सका, पर अन्य ऐसे अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि मरने के बाद भी जीव चेतना का अस्तित्व बना रहता है। इस तथ्य की साक्षी में प्रेतआत्माओं की हलचले तथा पुनर्जन्म की ऐसी घटनाएं प्रस्तुत की जा सकती है जो अनेक व्यक्तियों के अनुभव में आई है और उन्हें भुलाया नहीं जा सकता ।इस प्रकार पुनर्जन्म के भी अगणित प्रमाण मिलते हैं जिससे सिद्ध होता है कि पिछले जन्म की ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण नए जन्म में स्मरण बना रह सकता है जो अन्य लोगों को पता नहीं था । किसी ने सीखा-पढ़ाकर पूर्व जन्म विवरण का कौतूहल तो खड़ा नहीं कर दिया है, इस आशंका की काट उन प्रमाणों से हो जाती है जिनमें बालकों ने अपने पूर्व जन्म के संबंधियों को पहचाना और नाम लेकर पुकारा है। इसी प्रकार उन्होंने नितांत व्यक्तिगत ऐसी घटनाएं सुनाई है जो संबद्ध व्यक्तियों के अतिरिक्त अन्य लोगों को पता

नहीं हो सकती थी। जमीन में अपना गड़ा हुआ धन बताकर उसे निकलवाना पूर्व स्मृति का ठोस प्रमाण समझा जा सकता है ।प्रेतआत्माओं के अस्तित्व और पुनर्जन्म के प्रत्यक्ष प्रमाण को यदि प्रयोगशाला सिद्ध तथ्यों की तुलना में माना जा सके तो फिर आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व के संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह सकती । “दी हुमन पर्सनैलिटी एट इट्स सर्वाइवल आफ बाडीली डेथ” नामक पुस्तक में ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं जो शरीर से पृथक आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व को सिद्ध करते हैं

कई उदाहरण एक व्यक्ति के शरीर पर किसी दूसरी आत्मा द्वारा आधिपत्य रखने और फिर उसे मुक्त कर देने के हैं। साथ ही संगीत ,गणित , ललित कलाओं आदि में अद्भुत क्षमता वह प्रवीणता वाले बच्चों के विवरण भी हैं जिनका असाधारण ज्ञान पूर्व जन्म की संचित ज्ञान सामग्री ही सिद्ध होता है। आइंस्टाइन ने सृष्टि के मूल में चेतना को सक्रिय माना था। नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिकीविद श्री पिपरे दी कोमते ने आत्मा को विश्व आत्मा से संबंधित बताया है तथा इसी आधार पर उसे अमर भी कहा है क्योंकि विश्व चेतना अमर है और आत्मा उसी की छोटी इकाई मात्र है ।भारतीय दर्शन और संस्कृति आदि काल से आत्मा की अखंडता पर आस्थावान है ।अणु मात्र होकर भी वह संपूर्ण शरीर पर आधिपत्य रखता है। भावनात्मक परिष्कार से आत्मबल बढ़ता है और अपने स्वरूप को जानने वाला जीवात्मा ईश्वर से एक रूप हो जाता है।

The existence of the soul be accepted

Swami Vivekananda became very famous after the Chicago lecture.  Then he set out on a trip to Europe and from place to place he preached the philosophy of Vedanta all over Europe.  One day after the lecture, a person asked, “Who is the true Indian?”  Swami Vivekananda said that a true Indian is one who believes in the principle of karma and rebirth, that is, he accepted the existence of the soul.  The existence of the soul could not be proved in laboratories, but other such irrefutable evidence exists which proves that even after death, the existence of living consciousness remains.  Witnessing this fact can present such incidents of demonic movements and rebirth which have come in the experience of many people and cannot be forgotten. Thus, there is also a lot of evidence of rebirth, which proves that the past lives  The details of many such incidents can be remembered in the new birth, which other people did not know.  No one has raised the question of pre-birth details by teaching and learning, this apprehension is cut off by the evidence in which the children have identified and called the relatives of their former birth.  In the same way, he has narrated very personal incidents which other than the concerned persons know.

  It can be considered as a concrete proof of pre-memory by exposing its buried wealth in the ground. If there is direct evidence of the existence and rebirth of the spirit souls than the laboratory proven facts, then there is no scope for doubt of the existence of the soul and the divine.  Can not live  The book titled “The Human Personality at its Survival of Body Death” presents many examples that prove the independent existence of a soul separate from the body.

There are many examples of the possession of one person’s body by another soul and then freeing it.  Also, the amazing ability in music, mathematics, fine arts, etc. are also the details of children with proficiency whose extraordinary knowledge proves to be the accumulated knowledge material of previous birth.  Einstein considered consciousness active at the core of creation.  Nobel Prize winning physicist Mr. Pipre Di Komte has described the soul as related to the world soul and on the basis of this, it is also called immortal because the world consciousness is immortal and the soul is only a small unit of it.  But it is trustworthy. Despite being just a person, he has control over the entire body.  Emotional sophistication increases self-confidence and the person who knows his form becomes a form of God.

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