नव-सन्यास ( Neo – Sanyas)

एक सन्यास जो इस देश में हजारों वर्षों से प्रचलित है , जिससे हम सब भली भांति परिचित हैं। आपने घर परिवार छोड़ दिया , भगवा वस्त्र पहन लिए,चल पड़े जंगल की ओर, इस प्रकार का सन्यास तो लोगों के लिए त्याग का दूसरा नाम है , वास्तव मे तो यह जीवन से भगोड़ापन है, पलायन है ,और एक अर्थ में आसान भी है , आज है कि नहीं , लेकिन कभी अवश्य आसान था , भगवा वस्त्रधारी की पूजा होती थी , उसने भगवा वस्त्र पहन लिए इसके लिए बस इतना पर्याप्त था, वह इसलिए आसान था कि आप संसार से भाग खड़े हुए तो संसार की सब समस्याओं से मुक्त हो गए क्योंकि समस्याओं से कौन मुक्त नहीं होना चाहता लेकिन जो लोग संसार से भागने की अथवा संसार को त्यागने की हिम्मत न जुटा सके,समूह में बने रहें , उन्हें त्याग का यह कृत्य बहुत महान लगने लगा, वैसे सन्यासी की पूजा करते रहे और सन्यास के नाम पर, पर-निर्भरता का कार्य चलता रहा , सन्यासी अपनी जरूरतों के लिए संसारी पर निर्भर और तथाकथित त्यागी भी बना रहा , लेकिन ऐसा सन्यास आनंद न बन सका, मस्ती न बन सका, दिन -हीनता में कहीं कोई प्रफुलता होती,आनंद होता है ?,परजीवी कभी खुश हो सकता है? , धीरे-धीरे सन्यास सड़ गया। ओशो ने वर्तमान में सन्यास को पुनर्जीवित किया, ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी । सन्यास पहले इतना कभी समृद्ध न था जितना आज ओशो के संस्पर्श से हुआ है।किसी भी चीज को पाने के लिए कुछ भी छोड़ना जरूरी नही है,कबीर ने कुछ भी नही छोड़ा और सब कुछ पा लिया। इसलिए यह नव-सन्यास है।

Neo-Sanyas :- A renunciation that has been practiced in this country for thousands of years, with which we are all familiar.  You left the family at home, put on saffron clothes, walked towards the forest, this kind of renunciation is another name of renunciation for the people, in fact it is fugitive from life, escape, and in a sense also easy.  , Today or not, but it was always easy, saffron clothes were worshiped, he wore saffron clothes, it was enough for that, it was easy because if you run away from the world then you are free from all the problems of the world.  Went because who does not want to be freed from problems, but those who could not muster the courage to run away from the world or abandon the world, stay in the group, they felt this act of renunciation very great, by the way they worshiped the sannyasin and the sannyas  In the name, the work of dependence continued, the monk continued to depend on the world for his needs and even the so-called renunciation, but such a sannyas could not become bliss, could not be fun, there would have been some profligacy, bliss in day-time.  Is?, Can the parasite ever be happy?  , Slowly the sannyas rotten.  Osho revived the present-day sannyas, Osho again gave him the meditation of Buddha, Krishna’s flute, Meera’s ghungroo and Kabir’s fun.  Sannyas was never as prosperous as it is today with Osho’s touch. To get anything, it is not necessary to leave anything, Kabir left nothing and got everything.  Therefore it is neo-renunciation.

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