“आत्महत्या”-अपराध या मनो विकृति “Suicide” – “Crime or Psychosis”

प्रत्येक व्यक्ति जीवित रहना चाहता है और अपने जीवन से प्यार करता है । वह उसकी सुरक्षा के लिए तरह तरह से साधन जुटाता है। मृत्यु से सभी को डर लगता है। हम लोग अनेक वीडियोस में देखते हैं कि सामने मौत आने पर पशु- पक्षी तक संघर्ष करने पर उतारू हो जाते हैं ,अर्थात प्रत्येक जीवधारी को जीवन से बहुत प्यार होता है, फिर भी यह देखा गया है कि मनुष्य छोटे-छोटे कारणों से उसे गवांने और आत्मघात करने पर कटिबद्ध हो जाता है। आत्महत्या के कारणों का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य की सहनशीलता की क्षमता और शक्ति अलग-अलग होती है। एक ही प्रकार की समस्या पर एक व्यक्ति आत्महत्या करता है लेकिन दूसरा व्यक्ति उसे चुनौतीपूर्ण मानते हुए उसका सामना करता है और उसमें सफल भी होता है। समस्या की जटिलता सभी के लिए एक जैसी नहीं होती। एमिल दरखीम अपनी पुस्तक “ली सुसाइड” में लिखते हैं कि बीसवीं सदी में जितनी आत्महत्या हुई है उतनी संसार में इससे पूर्व कभी नहीं हुई। वे कहते हैं कि वास्तव में आत्महत्या का सीधा संबंध मानवी विकास से है । समय के साथ साथ बौद्धिक विकास जैसे-जैसे होता गया मानवीय जटिलताएं भी बढ़ती गई । बीसवीं सदी में यह विकास जब अपने चरम पर था तो उससे जुड़ी हुई समस्याएं भी उजागर हुई हैं । उनके अनुसार आज के सभ्य समाज की सबसे बड़ी कठिनाई मानसिक अस्वस्थता संबंधी है। यह अस्वस्थता ही आत्महत्या जैसे कठोर निर्णय का कारण बनती है। वह कहते हैं कि जंगली कबीले में रहने वाले वनवासी चूँकि सभ्य समाज से दूर रहते हैं इसलिए उनमें किसी प्रकार के मानसिक रोग नहीं पाए जाते, फलत: आत्मघात जैसे मामले भी उस समुदाय में कभी प्रकाश में नहीं आते। ऐसी बात नहीं है कि साधारण पढ़ा लिखा और सामान्य स्तर का नागरिक ही अपघात करता है कई बार विद्वान और ज्ञानवान समझे जाने वाले लोग भी इस कुकृत्य के शिकार हो जाते हैं इनमें विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार संगीतकार से लेकर बड़े राजनेता और वैज्ञानिक तक सम्मिलित हैं। जर्मन विद्वान गेटे आत्महत्या करना चाहते थे इसलिए एक धारदार चाकू बाजार से खरीद लाए बहुत दिनों तक वे उसे तकिए के नीचे रखे रहें पर हिम्मत नहीं जुटा सके इसलिए अंततः आत्महत्या का विचार त्याग दिया।

वायरण जिन दिनों “चाइल्ड हेराल्ड “के लेखन में व्यस्त थे उन दिनों अक्सर उन पर आत्महत्या की सनक सवार रहती थी पर मां का प्यार याद करके वह वैसा न कर सके। यूनान के महान दार्शनिक डायनोजिज, अपने हाथों फांसी लगाकर मरे थे। संसार पर राज करने का सपना देखने वाले हिटलर ने भी अपनी पिस्तौल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। मृच्छकटिक के लेखक शूद्रक आग में जल मरे थे ।”जानकी हरण” महाकाव्य के रचनाकार सिंहल देश के राजा की मृत्यु का शोक ना सह सके और चिता में जल मरे । चीनी साहित्यकार लाओत्से ने भी अपनी मौत स्वयं बुलाई थी ।

लेटिन कवि एमपेडोकलिज ने ज्वालामुखी में कूदकर आत्महत्या किया था । लुकेशियस ने अपने को चिरस्मरणीय बनाने के लिए ऐसा किया था। महाकवि चैटर्टन ने दरिद्रता से पीछा छुड़ाने के लिए विषपान करना उपयुक्त समझा । गोर्की ने पेट में पिस्तौल चलाकर उसे विदीर्ण कर डाला। ऑस्ट्रेयाई साहित्यकार स्टीफेंन ज्वीग अपने अपघात का कारण बताते हुए अपने पीछे एक पत्र छोड़ गए थे जिस पर लिखा था ” अब संघर्षों से टकराने की मेरी शक्ति चूक गई है, अशक्त जीवन का अंत कर लेना मुझे अधिक अच्छा लगा। चित्रकार लाड़ट्रे ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े पड़े ही स्वयं को गोली मार ली। एक अन्य महान चित्रकार वानगाग ने भी अपना अंत ऐसे ही किया। रॉबर्ट क्लाइव ने अपने जीवन में तीन बार आत्महत्या का प्रयास किया पर निशाना चूक जाने से हर बार वे बच गए। मूर्धन्यों में भी ऐसे कम नहीं है जिन्होंने तनिक से परेशानी से उद्विग्न होकर आत्मघात कर लिया हो ऐसे लोगों में सेफो , डेमोंस्थनीज, ब्रूटस, केसीयस, डेमोक्लीज, हनिवाल, बर्टन, आर्थर कोयसलार जैसे विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व सम्मिलित है। भारत में भी ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने दौलत और शोहरत के बावजूद आत्महत्या की जिसमें प्रमुख गुरुदत्त, दिव्या भारती, प्रत्यूषा बनर्जी, जिया खान शामिल है ।

जिस प्रकार शरीर में अनेक प्रकार के घातक विषाणु प्रवेश करके विविध लक्षणों वाले रोग उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार मन क्षेत्र में भी इसी तरह की कोई विकृतियां अपने जड़े जमा लेती है और परिपूर्ण उन्माद ना सही उससे मिलते-जुलते ही विघातक मानसिक रोग उत्पन्न करती है। किशोरावस्था की हिंसात्मक सनक, आवेश का सामयिक दौरा, अवसादग्रस्ता ,स्नायुविक असंतुलन जैसी कितनी ही विकृत मन: स्थितियां ऐसी है जो विवेक को अस्त-व्यस्त करके रख देती है और समय अनुसार जो भी उभर आता है उसी में मस्तिष्क इतनी तीव्र गति से बहता चला जाता है जिसमें अपने को संभाल सकना कठिन पड़ता है। दूसरों के गुस्से को शांत करने के लिए स्वयं दुखी होने की स्थिति अपना लेना भी ऐसा ही विचित्र चिंतन है जिसे अक्सर सहानुभूति एवं सहायता के लिए अपनाया जाता है । अभिभावकों के कष्ट निवारण के लिए विवाह योग्य कन्याओं का इसलिए आत्मघात कर बैठना कि इससे उनके माता-पिता को अर्थ चिंता से छुटकारा मिल जाएगा ऐसा ही दुख भरा कदम है । इनमें आदर्शवाद , उदारता, सहानुभूति जैसे तत्वों का पुट तो होता है परंतु यह स्मरण नहीं रहता कि इस कदम से अपना बहुमूल्य जीवन ही नष्ट नहीं होगा अपितु जिनके लिए यह सब किया जा रहा है उनकी कठिनाई, चिंता एवं विपत्ति और अधिक बढ़ जाएगी । आत्महत्या किसी भी सभ्य समाज का लक्षण नहीं है अपितु असभ्यता का लक्षण कहना चाहिए। आत्महत्या को भी दूसरों की हत्या के समान ही अपराध कर्म माना जा सकता है। युरोप के देशों में पुराने जमाने से इसे बहुत बुरा कहा जाता था और मरने के उपरांत भी यह कुकृत्य करने वाले की भर्त्सना की जाती थी। यूरोप में उन दिनों आत्महत्या करने वालों के प्रति बहुत अनुदार दृष्टिकोण था , उनकी लाशें सड़कों के आसपास कूड़े के ढेर में दबा दी जाती थी और उसके आगे भयंकर आकृतियां खड़ी कर दी जाती थी ताकि मरने वाले की निंदा हो सके और जो ऐसा करना चाहते हैं वह हतोत्साहित हो। कुरान में दूसरों की हत्या करने से भी अधिक जघन्य पाप आत्महत्या को बताया गया है । यहूदी धर्म में यह निंदनीय कर्म करने वाले के लिए शोक मनाने और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने का भी निषेध है । ईसाई धर्म में भी इसे घृणित कार्य बताया गया है । 11वीं शताब्दी में इंग्लैंड में एक कानून बना था जिसमें आत्महत्या करने वालों की संपत्ति जप्त कर ली जाती थी और उसके शव को किसी भी ईसाई कब्रिस्तान में धार्मिक विधि से दफनाया नहीं जा सकता था । आत्महत्या का प्रयत्न करने वाले को रोगी माना जाए या अपराधी इस प्रश्न पर आज भी मन:शास्त्रियों, मानव विज्ञानियों और विधिवेत्ताओं के बीच गंभीर मतभेद हैं। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि ऐसे लोगों का उचित स्थान जेलखाना नहीं पागल खाना है, जबकि विधिवेत्ताओं की दलील है कि यदि हम किसी को दारुण वेदनाओं से मुक्ति नहीं दिला सकते तो उसे ऐसी मौत मरने का अधिकार होना चाहिए जिसमें वह पीड़ा झेलने की अपेक्षा, राहत पा सके । कुछ लोग मध्यम मार्ग अपनाते हुए उसे करुणा का पात्र घोषित करते हैं और इच्छा मृत्यु के नाम पर उन पर सहानुभूति प्रकट करते हुए समाज को उनकी समस्याओं को हल करने का सुझाव देते हैं । शोध अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जिन-जिन देशों में आत्मघात की दर उच्च है वहां वहां शराबियों की संख्या भी उसी अनुपात में ज्यादा है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि अमेरिका, स्विजरलैंड , स्वीडन,डेनमार्क एवं फ्रांस में विश्व की सर्वाधिक आत्महत्या होती है और शराब की लत वहां उसी अनुपात में देखी गई है, इससे यह स्पष्ट है कि आत्महत्या का कारण शारीरिक कम मानसिक अधिक है। अर्थ के साथ साथ समाज की अवांछनीय परिस्थितियां भी मनुष्य को विक्षुब्ध करती है । स्नेह- सौजन्य का अभाव, नैतिकता का गिरता स्तर ,शोषण, उत्पीड़न ,ठगी ,विश्वासघात बेकारी, हानि,बर्बादी जैसे कितने ही कारण मानव को दुखी बनाते हैं । सामाजिक कुरीतियों के कुचक्र में कितनों को ही पीसना पड़ता है। इन प्रचलनों को बंद करना सरकार और समाज का काम है। समाज की संरचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें हर व्यक्ति को निर्वाह, प्रगति और सुरक्षा के लिए समुचित साधन प्राप्त हो, कोई किसी के भी साथ अन्याय और अनीति नहीं कर सके, इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य भी होना चाहिए कि स्वास्थ्य रक्षा और अर्थ उपार्जन की तरह ही चिंतन तंत्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्वसाधारण में उत्पन्न की जाए, इसके लिए मानसिक प्रशिक्षण की समर्थ प्रणाली खड़ी की जानी चाहिए। इसके बिना आत्महत्या जैसे व्यापक संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़काया हुआ दावानल रोका ना जा सकेगा। जीवन जीने के लिए हम सबको मिला है मरने के लिए नहीं, यह तथ्य हर स्थिति में याद रखा जाना चाहिए, अनेकानेक योनियों में भटककर मानव योनि में जीव जब आता है तो इसलिए कि कर्म करते हुए अपनी मुक्ति का पथ प्रशस्त कर लें किंतु विक्षुब्ध स्थिति में प्रेत सा जीवन जीते हुए आत्मघाती प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होना उसे कदापि शोभा नहीं देता। सृष्टा के राजकुमार के रूप में मनुष्य को जो पदवी मिली है उसका तिरस्कार न कर जीवन चुनौती के रूप में, खिलाड़ी की तरह जिया जाए ,तो हंसते-हंसाते पुण्य कमाते, औरों की सेवा कर संतोष प्राप्त करते हुए यह जीवन जिया जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है।

“आत्महत्या”-अपराध या मनो विकृति “Suicide” – “Crime or Psychosis”

Everyone wants to live and love their life.  He uses various means to protect her.  Everyone is scared of death.  We see in many videos that when the time of crisis comes, the animals fight to survive, that is, every living being loves life very much, yet it has been seen that humans becomes determined to lose and commit suicide due to small reasons.  When we analyze the causes of suicide, we find that the capacity and strength of each individual to bear are different.  One person commits suicide on the same type of problem but the other person confronts him as a challenge and also succeeds in it.  The complexity of the problem is not the same for everyone.  In his book “Le Suicide”, Emil Darkheem writes that in the twentieth century there has never been as much suicide in the world as before.  They say that in fact, suicide is directly related to human development.  Over time, human development also increased as intellectual development progressed.  When this development was at its peak in the twentieth century, problems related to it have also been revealed.  According to him, the biggest difficulty of today’s civilized society is mental illness.  This malaise causes harsh decisions like suicide.  He says that since the forest dwellers living in the wild clan live far away from civilized society, they do not get any type of mental illness, as a result, cases like suicides never come to light in that community.  It is not the case that a simple, educated and normal level citizen is traumatized, many times scholars and knowledgeable people also fall prey to this misfortune, from world famous litterateur to musician to big politician and scientist.  German scholar Goethe wanted to commit suicide, so he bought a sharp knife from the market and kept it under the pillow for a long time, but could not muster courage, so eventually gave up the idea of suicide.

Vayaran, who was busy writing the “Child Herald”, often had a fad of suicide, but he could not do it by remembering the love of his mother.  The great philosopher Dionyses of Greece, died by hanging himself.  Hitler, who dreamed of ruling the world, also committed suicide by shooting him with his pistol.  Shudraka, the author of Mritchkatik, died in the fire. The creator of the epic “Janaki Haran” could not bear the death of the king of the Sinhala country and died in the pyre.  The Chinese litterateur Laotse also called for his death.

Latein poet Mpedoclidge committed suicide by jumping into the volcano. Lukeshi did so to make himself a secretive. Mahakavi Chattren considered to be suitable to dishellion to redeem a poverty. Gorkki scolded him in the stomach. Austrian Literary Stephenen Jhag left a letter behind him while explaining the cause of his trauma, “My power has missed my power to collide with struggles, I liked to end the null life. Painist Ladratre has four hospital

In the same way, similar distortions in the mind, such as the disease of various symptoms by entering several lethal viruses in the body, there is a craving mental disease and the perfect frenzy does not meet the perfect mania. How many deformed minds like adolescence, occasional visits of charge, occasional, neurological imbalance, which keeps discrimination, and whichever emerges according to time, the brain is so intense. To calm the anger of others, it is a strange contemplation that is often adopted for sympathy and assistance. For the troubleshooting of the parents, there is a sad step that will get rid of a girl that will get rid of the poor economic condition of their parents. Among them, there is a look of elements like idealism, generosity, sympathy, but it does not remember that this step will not be destroyed by this step, but for which all this is being done, the difficulty, anxiety and calamity will increase. Suicide is not a symptom of any decent society, but the symptoms of rusticity should be said. Suicide can also be considered as crime karma similar to the killing of others. It was very badly called it very bad in the countries of Europe, and after the death, it was also condemned by the person. In Europe there was a very constrict approach towards those who commit suicide, their corpses were suppressed in the stack of garbage around the streets and the fierce figures were made ahead so that the die can be condemned and those who want to do it are discouraged.

In Jewish religion, it is also prohibited to celebrate for the condemnable karma and pray for the peace of his soul. It has also been described in Christianity. There was a law in England in the 11th century, in which the property of suicide was seized and his body could not be buried with religious law in any Christian cemetery. The person who tries to suicide should be considered a patient or the criminal is also serious differences between the scribes, human sciences and legislatures. Psychologists are not that the proper place of such people is not a crazy food, whereas the laws are argued that if we can not get rid of anybody from the penetration, then it should have the right to die in which the path is expected to suffer. Some people adopt a medium route, declare him a character of compassion and describes the society to solve their problems while expressing sympathy on them in the name of death. Research studies have been known that the number of alcohols there is also much in the same proportion where the rate of discrimination in which the rate of dishonesty is high. Researchers say that America, Switzerland, Sweden, Denmark and France have the highest suicide in the world and alcohol addiction has been seen in the same proportion, it is clear that the cause of suicide is less mental more. Along with the meaning, undesirable circumstances of society also disrupts man. The lack of affection – the lack of courtesy, the loss of morality, exploitation, harassment, cheating, betrayal uncomfortable, loss, a waste, make humans. Many people have to grind in the Kuchraks of Social Certain. Closing these pictures is the work of the government and society. The structure of the society should be such that every person has received proper means for subsistence, progress and security, no one can do injustice and unreliable, in addition, another important task should also be that the ability to correct the right use of the contemplation mechanism like health defense and meaning. Without it, the psychiatrists will not be stopped to prevent the psychiatricians like a comprehensive crisis. To live life, we have not got to die, not to be remembered in every situation, . As a prince of Sovereign, the person who has received the title of the life, as a challenge, if the player goes like a player, earning laughing virtue, and getting satisfaction by serving others, it can be no doubt. There is no doubt.

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