यह मूड क्यों ऑफ हो जाता है ? Why this mood gets off ?

आजकल एक नया रूप चला है उस रूप का नाम है मूड ऑफ होना। आधुनिक समय के सभ्य व शिक्षित कहे जाने वालों में प्राय: अधिकांश इससे ग्रसित हैं। उनको यह कहते हुए सुना जा सकता है कि आज तो अमुक काम कर ही नहीं सके, मूड ही नहीं हुआ क्या करें, आज तो ऑफिस जाने का मन ही नहीं हुआ, इस रोग की दवा किसी चिकित्सक के पास नहीं है। इसकी दवा उन्हीं लोगों के पास है जो यह कहते हैं कि मूड ऑफ था।

वैसे यह रोग है बड़ा भयंकर । दवा नहीं की तो जीवन को शुष्क, नीरस ही नहीं आकर्षक विहीन बना देता है। मूड ऑफ होने के लक्षण कुछ इस प्रकार होते हैं– शरीर के अंगों में हल्की पीड़ा शिथिलता व आलस्य का प्रभाव रहता है ,काम करने में अनुत्साह, सिर भारी और चित्त उदास तथा मन बेचैन रहता है। यह शिकायत आज 50 फ़ीसदी लोगों की रहती है। वस्तुतः यह हमारे अपने आप द्वारा शरीर और मन पर लादी गई अतिरिक्त थकान है जो निकट भविष्य में किसी ना किसी व्याधि के रूप में प्रकट होती है। शारीरिक शक्ति का जितना संबंध आहार से है उससे अधिक जीवन क्रम की नियमितता से है जिसने इस का नियमन और निर्धारण किया है उसे ना कभी थकान अनुभव होती है न कमजोरी, इसका मूल कारण मनुष्य की अनियमितताएं है जो मूड ऑफ होने की सांकेतिक बीमारी के रूप में प्रकट होती है। आज के समय में अनेकों साधन जुट जाने से शरीर को तो आराम मिला है पर मन काफी बोझिल हो गया है। वातावरण की कृत्रिमता और अर्थ प्रधान युग की जटिल प्रक्रिया कुछ ऐसी हो गई है कि मनुष्य को मानसिक रोगों से छुटकारा नहीं मिलता। इनसे हम जितना थकते हैं इतनी थकान श्रम शीलता से नहीं आती। प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक विचारक मनोविज्ञानी विलियम जेम्स ने अपनी पुस्तक द एनर्जी ऑफ मैन में अनेकों प्रकार से स्पष्ट किया है कि मनुष्य अपनी शक्ति का एक छोटा सा अंश ही काम में ले रहा है यदि वह संपूर्ण शक्ति से काम लेने की कला सीख जाए तो वह अपने जीवन में आश्चर्यजनक उपलब्धियां पा सकता है ।उन्होंने इन शक्तियों के ठीक से अभिव्यक्त ना होने के कारणों पर विचार करते हुए कहा है की सामान्यता संसार में दो तरह के आदमी होते हैं एक तो निष्क्रिय निकम्मे और दूसरे क्रियाशील । क्रियाशील लोगों की पंक्ति में आने वालों को उन्होंने पुनः दो वर्गों में बाटते हुए कहा कि एक के काम करने के पीछे भय समाया होता है,यदि काम नहीं करेंगे तो अधिकारी नाराज हो जाएंगे, पता नहीं वह कैसा व्यवहार करें आदि भेजनित समस्या है उन्हें घेरे रहती है दूसरी स्थिति के लोग लालच से ग्रसित होकर काम करते हैं। तरह-तरह के सपने बुनने गगनचुंबी कल्पनाएं करने में जुटे रहते हैं। जेम्स के अनुसार पहली स्थिति चिंताजनक अवसाद को जन्म देती है, शंकाओं से घिरे रहने के कारण इसमें आधे अधूरे मन से काम होता है। मूड की खराबी व अत्यधिक थकान ऐसी दशा में जन्म लेती है। दूसरी दशा में काम होता तो दिखता है ,पूरे मनोयोग के अभाव में शरीर के ज्यादा घसीटे जाने के कारण थकान व मूड की खराबी ही पल्ले पड़ती है । इन दोनों ही दशा में व्यक्ति की समूची क्षमताएं अभिव्यक्त नहीं हो पाती । एक तीसरी स्थिति का विवेचन करते हुए मनोविज्ञानी हेराल्ड ने अपने अध्ययन “हाउ टू लूज़ योर फियर्स ,शरमन एंड फाइंड युअर की टू हैप्पीनेस” में स्पष्ट किया है कि क्रियाशीलता को सुनियोजित एवं सुसंबद्ध करने से इस मूड ऑफ होने के रोग से छुट्टी मिलती है। उनके अनुसार एक औसत मनुष्य अधिकतम 16 से 18 घंटे क्रियाशील रह सकता है। यहां क्रियाशीलता का मतलब एक ही कार्य खुद को लगाने से नहीं है। इस अवधि में 6 से 8 घंटे उसे व्यक्तिगत जीवन की देखभाल, घर परिवार ,आत्मीय सम्बन्धियों में देने पड़ते हैं। इससे एक काम यह भी होता है कि वह हल्का होता और ताजगी प्राप्त कर लेता है। बचे हुए आठ से दस घंटे को श्रमशीलता में नियोजित किया जा सकता है ।शरमन का कहना है कि प्रारंभ में हो सकता है कि इस अवधि में लगातार काम करने में घबराहट, बेचैनी का सामना करना पड़े ।उन्होंने कई प्रयोगों में इसे सच पाया। देखा गया है कि काम छुड़ा देने पर बेचैनी घबराहट आदि सब गायब हो जाती है । निष्कर्ष में यह पाया गया है कि इसका कारण काम नहीं, श्रम- मनोयोग एवं जिम्मेदारी की भावना इन तीनों की असंबद्धता थी ।जैसे-जैसे सुसंबद्धता आती गई ,मूड ऑफ होने की तकलीफ भी दूर हुई और क्षमताएं भी बढ़ती गई। उन्हीं के शब्दों में जब स्वयं हम कोई काम करते हैं तो थोड़ी देर बाद थकान सी अनुभव होती है, उस समय काम छोड़ कर आराम किया जाए तो थोड़ी ही देर में थकान समाप्त हो जाती है,पर यदि काम करते ही रहा जाए तो भी थोड़ी ही देर में थकान समाप्त हो जाती है। उसके अनुसार दूसरी स्थिति में थकान का अनुभव ना होना व्यक्ति की कार्य के प्रति गहरी अभिरुचि दर्शाता है। वह कहते हैं कि यदि धीरे-धीरे कार्य में रुचि जगाकर उसमें मन को लगाकर काम करने की आदत डाली जाए तो मनुष्य आश्चर्यजनक रूप से अपनी कार्यक्षमता को बढ़ा सकता है। जिन्होंने भी जीवन में इस सूत्र को धारण किया कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां पा सकने में सफल हुए ,नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सीवी रमन ने एक स्थान पर अपने बारे में बताते हुए कहा कि प्रारंभ में बहुत देर तक पढ़ने से मेरा मन रह- रह कर उतर जाता था। पढ़ना चाहता था पर मूड न बनता, आखिर एक दिन मेरे पिता ने मार्ग सुझाया। कहा पहले पढ़ने के प्रति रुचि पैदा करो। शरीर और मन की असंतुलित दशा ही इसका प्रधान कारण है । धीरे-धीरे मैंने इसका अभ्यास शुरू किया और कुछ ही दिनों बाद फिर कभी मन उचट ने की शिकायत नहीं हुई। एक दिन बहुत काम किया दूसरे दिन ढीले पड़े हैं तो क्रमबद्धता टूटती है इसका हानिकारक प्रभाव भी पड़ता है। इसी प्रकार उत्तेजित दशा में कुछ करना भी ठीक नहीं होता हमारे क्रियाकलाप वर्ष भर बहने वाली सरिता की तरह अविरल रूप से एक गति में होने चाहिए ना कि बरसाती नाले की भांति जो 4 दिन तो किनारों को तोड़ता फोड़ता बहता है और बाकी दिन सूखा पड़ा रहता है । अनियमितता और कर्म हीनता मनुष्य की शक्तियों को वैसे ही चुका देती है जैसे बरसाती नाला। मनोविज्ञानी नेपोलियन हिल अपने अध्ययन “थिंक एंड ग्रो रिच” में इसका एक और कारण बताते हैं कि वह है शारीरिक और मानसिक श्रम में सामंजस्य न होना। प्रायः दिनभर दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी, अधिकारी मानसिक श्रम तो करते हैं पर शारीरिक श्रम की उपेक्षा कर देते हैं। इस असंतुलन के कारण मूड ऑफ होने की बीमारी ही उनके पल्ले पड़ती है। चाहे एक्सरे के आविष्कारक रोएंटजन हो या साहित्यकार आर्नल्ड रायनवी, किसी के भी जीवन का अध्ययन करें तो पायेंगे उन्होंने व्यस्त मानसिक कार्यों के साथ-साथ शारीरिक श्रम को भी महत्व दिया। हम अपने जीवन में भी यह कर सकते हैं। यदि हमारा काम मानसिक है तो थोड़ा सा शारीरिक श्रम चाहे वह खेलकूद हो या बगीचे में फूल पौधे ठीक करना, यह हमारे मूड़ को हल्का फुल्का बना देंगे। यदि काम शारीरिक श्रम संबंधी हो तो रचनात्मक साहित्य का अध्ययन बिगड़े मूड को ठीक कर देगा ,और वह अड़ियल टट्टू की तरह जहां तहां अड़ना बंद कर देगा। यदि हम कार्य में श्रम , मनोयोग एवं जिम्मेदारी की भावना का सम्मिश्रण करना तथा जीवन क्रम का सुनियोजन करना सीख जाए तो हमारी क्षमता कई गुना विकसित हो सकती है और कार्य का स्तर भी बढ़ सकता है। पिछड़ापन तो दूर होगा ही साथ ही साथ मूड खराब होने की शिकायत भी ना रहेगी।

Why This Mood Gets Off ?Nowadays a new look is that the name of that form is mood. Those who are called civilized and educated modern times often have most of it. They can be heard saying that today can not work, do not have the mood, today it has not been the mind to go to the office, the medicine of this disease is not near a physician. Its medicine has the same people who say that the mood was.

Well this disease is bigger. If not medicine, then life makes dry, monotonous not only attractive. Symptoms of mood are some such things – light pain in body parts, the impact of dysfunction and laziness, the unusual in working, the head is heavy and mindlessness and mind restless. This complaint is of 50 percent of the people today. In fact, it is our own licked by the body and mind, which appears in the near future as a disease. The regard to the physical power is more about the regularity of the life, which has regulated and determined this, neither fatigue does not have fatigue, or the weakness, it is the irregularities of humans, which appears in the form of a sign of the mood. In today’s time, the body has received comfort, but the mind has become quite cumbersome. The complicated process of artificiality and meaning of the environment has become something that humans do not get rid of mental diseases. As much as we tired of them, so much fatigue does not come from labor. The famous British writer thinker, William James has clarified many ways in his book “The Energy of Man”, that man is taking a small fraction of his power to work if he learned the art of working with full power, he can find amazing achievements in his life. He again in two sections, he said that there is a fear behind doing one’s work, if he does not work, then the officer will be angry, do not know how it is sent. The problem is surrounded by the other situation. Kinding types of dreams are engaged in doing skyscrap fantasy. According to James, the first position gives birth to worrisome depression, due to the surrounding the doubts, it works with half incomplete mind. Mood’s malfunction and excessive fatigue born in such a condition. If it was worked in the second condition, it seems, due to the absence of the body more dragging more fatigue and mood. In these two conditions, the person’s entire capabilities could not be expressed. While discussing a third position, Psychologist Herald has clarified his study in “Haw to Loose Your fears, Sharman find Your key to Happyness” that this mood is being planned and cooperated. According to him, an average man can remain functional from 16 to 18 hours. Here the actual meaning is not by applying the same work itself. In this period, 6 to 8 hours have to give him personal life care, home family, self-relatives. This also works that it would have been light and get freshness. The remaining eight to ten hours can be employed in labor. Sharman says that in the beginning there may be a panic in working continuously in this period. They found it true in many experiments. It has been observed that the restlessness of the work is disappeared, all disappears. In the conclusion it has been found that the reason for this is not the reason, the feeling of labor-mind and responsibility was the dishonor of these three. As well as the problem of mood was also removed and the capabilities also increased. In their words, when we do any work, fatigue is experienced after a while, leaving the work at that time, fatigue ends in a while, but even if it is done, fatigue ends. Accordingly, there is no experience of fatigue in the second position, the deep interest towards the person’s work. He says that if gradually waking up the interest in the work, the habit of working in the mind, then humans can surprisingly increase their functionality. Whoever used to get some important achievements in life, Nobel Prize Winners, the famous scientist CV Raman said about himself, saying that I was reading in a very long time. Wanted to read but the mood was not made, one day my father suggested the way. Create interest to read first reading. The unbelievable condition of the body and mind is the reason. Slowly I started practicing it and after a few days again, the mind did not complain. One day a lot of work has been loose on the second day, then the harmful effect has a harmful effect. Similarly, it is not good to do something in a stimulated condition, our activities should be inclined to be in a speed like a river flowing throughout the year, not like rainwater drains, which breaks the edges, and the rest were dry. Irregularity and action will be made to the powers of human beings like rainy nights. Psychologist Napoleon Hill explains another reason in his study “Think and Grow Rich” that he is not harmony in physical and mental labor. Often employees working in the office, the officials do mental labor but they ignore physical labor. Due to this imbalance, the disease of the mood is their breath. Regardless of the inventor of X-ray roentjen or writers, Rayanvi, study the life of anyone, they will also find the importance of physical labor along with busy mental work. We can do this even in our life. If our work is mental, if a little physical labor, whether it is a sports or flowering plants in the garden, it will make our mood light. If the work is physical labor, then the study of creative literature will fix the deteriorate mood, and it will stop the adulteration like the oyster pony. If we learn to make a message of labor, manage and responsibility in the work and learn to ensure the life order, then our ability can develop manifold and the level of work can also increase. The backwardness will be far away, as well as the complaint of bad mood will not be.

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