व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की धुरी- “अध्यात्म”The axis of all-round development of personality – “Spirituality”

मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन एवं मानव समाज में सुख शांति की परिस्थितियां किस आधार पर बनेगी इस प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर दिया जाए तो वह होगा मनुष्य में मनुष्यता के विकास से । इसी को प्राचीन काल से व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास भी कह सकते हैं ।व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का तात्पर्य मात्र शारीरिक स्वच्छता एवं बौद्धिक प्रखरता के जोड़ को मानना भूल होगी , इसका सही व स्वस्थ स्वरूप सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को व्यक्तित्व में विकसित करने से प्रकट होता है।

मानवीय समाज में व्यक्तित्व के विभिन्न स्तर दिखाई देते हैं ।एक से काया-कलेवर के होते हुए भी गुण कर्म स्वभाव का अंतर हरेक की अपनी अलग पहचान बना रहता है। मानवीय मूल्यों की अवहेलना कर उल्टी राह पर चलने वाले नर-पशु ,नर- पिशाच की श्रेणी में गिने जाते हैं, तो सांस्कृतिक एवं सामाजिक आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति पर चलने वाले , महामानव की श्रेणी में जा विराजते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अंदर यह जिज्ञासा बराबर बनी रही कि परिपक्व व्यक्तित्व की पहचान क्या है? उसके सही लक्षण क्या है?

इस संदर्भ में प्रोफेसर जीडी डब्ल्यू ऑलपोर्ट ने अपने मंतव्य इस प्रकार प्रकट किए हैं –” व्यक्ति की परिपक्वता अपने अपने गुणों के विस्तार एवं कमियों को खुले दृष्टि से स्वीकार कर सुधारने की वृत्ति के साथ आती है”.एक परिपक्व व्यक्ति के जीवन दर्शन में एकरूपता का समावेश होता है। उसके अंतस में मानव मात्र के कल्याण की भावना विकसित होती है जिसके आधार पर वह समता, सौहार्द्र ,सहयोग तथा मैत्रीपूर्ण व्यवहार करता दिखाई देता है ।

मूर्धन्य मनीषी अब्राहम मैस्लो ने अपनी पुस्तक” टुवर्ड्स आ साइकोलॉजी आफ बीइंग”में परिपक्व व्यक्तित्व की व्याख्या करते हुए लिखा है कि हर व्यक्ति आत्मा सिद्धि प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है यही उसकी समस्त क्रियाओं की अभिप्रेरणा है किंतु जब तक व्यक्ति अपने में सादगी, शालीनता,सच्चरित्र जैसे आध्यात्मिक गुणों का विकास नहीं कर लेता उसके व्यक्तित्व में परिपक्वता और सर्वांगीण उन्नति नहीं आती है । आत्मसिद्धि उसके बाद का अगला चरण है। मेसलौ के शब्दों में इस प्रकार का व्यक्तित्व जीवन और समाज के यथार्थ को भलीभांति ग्रहण करता है उसके जीवन में अधिक सहजता होती है। वह जीवन की समस्याओं को तटस्थ होकर समझता है और उसका समाधान ढूंढता है स्वयं समस्याओं से प्रभावित नहीं होता । मेसलौ के ऐसे व्यक्तित्व की परिकल्पना में और गीता के समत्व भाव से युक्त पुरुष में कोई अंतर नहीं है ।मनोवैज्ञानिक साइमंड्स ने भी परिपक्व व्यक्ति को आंतरिक द्वंद्व और बाह्य दुर्गुणों से मुक्त बतलाया है।

भारतीय जीवन दर्शन का निचोड़ हमें गीता में मिलता है अतः गीता में वर्णित आदर्श पुरुष की व्याख्या से परिपक्वता की परिभाषा मिलती है इसके अनुसार व्यक्ति के स्वभाव एवं स्वरूप में तीन गुणों की प्रधानता होती है। ये गुण है सत,रज और तम – इन्हीं तीन गुणों से प्रभावित समूचा मानव समुदाय दिखाई देता है लेकिन सभी व्यक्तियों में इन तीनों गुणों की मात्रा समान रूप से नहीं होती। गुणों की मात्राओं का भेद व्यक्ति के व्यक्तित्व में परिपक्वता संबंधी भिन्नता भी उत्पन्न करता है । सतोगुण की प्रधानता से व्यक्ति ज्ञान पर बल देता है , शरीर स्वास्थ्य अच्छा होता है, सतोगुण की विशेषताएं है निर्मलता, इस गुण की प्रधानता लिए व्यक्ति मन में सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति बनाए रखने के कारण श्रेष्ठ होते हुए भी जीवन में कठिनाइयों को अनुभव करता है । रजोगुण प्रधान व्यक्ति में आसक्ति अत्यधिक होती है और इस कारण व विभिन्न प्रकार की तृष्णाओं और कामनाओं से ग्रस्त रहता है। तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति अज्ञानी होता है । वह लापरवाही से काम करता है उसमें आलस्य प्रमाद एवं विभिन्न प्रकार के भ्रमों की प्रधानता होती है । तात्पर्य यह है कि इन कमियों के रहते व्यक्ति गीता के अनुसार परिपक्व नहीं होता । गीताकार ने ऐसे व्यक्ति की व्याख्या करते हुए कहा है —“वह निरंतर आत्म- भाव में स्थित होकर दुख-सुख को समझने वाला है, धैर्यवान है, प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है वह निंदा स्तुति में भी समान भाव वाला है, वह संपूर्ण कार्यों में कर्तापन के अभिमान से रहित रहता है । इसके अनुसार परिपक्व व्यक्ति के लक्षण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के समान होते हैं अतः गीता के अनुसार गुनातीत एवं स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ही परिपक्व व्यक्ति है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी दृष्टि को सीमित तथा क्षणिक स्वार्थों से हटाए, अहंकार की बेड़ियों को तोड़ें,और स्नेह- सौजन्य के आधार पर विकसित “वसुदेव कुटुंबकम” की भावना को अंगीकार करें । यह छोटा कदम भी व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा । इसी के सहारे वसुंधरा पर सुख शांति का साम्राज्य स्थापित हो सकेगा, समय की मांग भी यही है।

If a brief answer to this question will be made on the basis of the conditions of happiness and peace in human personal life and human society, it will be from the development of man in man.  This can also be called the all-round development of personality since ancient times. The all-round development of personality would simply mean mistaking the addition of physical hygiene and intellectual intelligence, its right and healthy form by developing social, moral and spiritual values ​​in the personality.  appears in.

Different levels of personality are seen in human society. In spite of body-to-body appearances, the difference of virtue and nature, each has its own distinct identity.  Humans, who follow the human values, are counted in the category of male-vampire and male-vampire, while those who follow the way of life in accordance with cultural and social ideals, they fall into the category of superhuman.  The curiosity within the psychologists remained equal that what is the identity of a mature personality?  What are its true characteristics?

In this context, Professor GD W. Allport has expressed his intentions as follows – “The maturity of a person comes with an instinct to improve his / her own qualities and to accept the shortcomings openly”.  Consists of uniformity.  At the end of it, a feeling of well being of the human being develops, on the basis of which he is seen to be equanimity, harmony, cooperation and friendly behavior.

In his book “Towards a Psychology of Being”, the sage Abraham Maslow explained that a person is on the path towards attaining soul fulfillment. This is the motivation of all his actions, but as long as the person has simplicity in himself,  He does not develop spiritual qualities like decency, saccharitra, does not bring maturity and all round progress in his personality.  Self-realization is the next step after that.  In the words of Maslow this kind of personality perfectly embraces the reality of life and society, there is more ease in his life.  He understands the problems of life in a neutral manner and seeks solutions to it, himself is not affected by the problems.  There is no difference between Maslow’s hypothesis of such a personality and that of a man with the Gita’s eloquence. Psychological Symonds has also shown the mature man to be free from internal duality and external enemies.

We get the squeeze of the philosophy of Indian life in the Gita, so the interpretation of the ideal man described in the Gita gives the definition of maturity, according to which the nature and nature of the person has three qualities.  These qualities are Sat, Raj and Tama – the entire human community is affected by these three qualities, but not all people have the same amount of these three qualities.  The distinction of qualities of qualities also produces maturity differences in the personality of the person.  Due to the predominance of Satoguna, the person emphasizes knowledge, body health is good, the qualities of Satoguna are cleanness, due to the preponderance of this quality, a person experiences happiness and difficulties in life, due to his superiority and attachment to knowledge  Does.  Attachment is excessive in the predominant person of Rajoguna and for this reason, he suffers from various kinds of desires and desires.  A person affected by tamoguna is ignorant.  He acts carelessly and has laziness, prominence and various kinds of delusions.  This means that a person does not mature according to the Gita in spite of these shortcomings.  The lyricist has interpreted such a person as saying – “He is constantly in self-realization, who understands misery and happiness, is patient, considers dear and obnoxious as equal; He is also equal in condemnation praise,  He is devoid of the presumption of subjectivity in all works. According to this, the characteristics of a mature person are similar to the situated person, so according to the Gita, the person who is Gunate and situated is a mature person.

The need is that we remove our vision from limited and momentary interests, break the shackles of the ego, and embrace the spirit of “Vasudeva Kutumbakam” developed on the basis of affection.  This small step will also prove to be an important step towards the all-round development of personality.  With this, an empire of peace and peace will be established on Vasundhara, this is also the need of the hour.

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